भई वाह! डॉ. आंबेडकर के प्रपौत्र सुजात आंबेडकर ने क्या बात कही कि देश में जातीय हिंसा फैलाने का काम अधिकतर उच्च वर्णीय ब्राह्मण ही करते हैं...
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आइए, विस्तार से बात करते हैं...

देश और दुनिया में अराजकता फलाने वालों का DNA एक ही है; लेकिन उन्हें 'उच्चवर्णीय' कहना 'उच्चता' के स्तर का घोर अपमान है...! दरअसल ये वर्ग आंतरराष्ट्रीय स्तर का 'अल फ़ायदा' संगठन है जो हर हाल में अपने फ़ायदे का सोचता है! ये हज़ारों सालों से उन्ही की भीख पर पल रहा है जिसे ये नीच, अस्पृश्य कहता आया है...!

हक़ीक़त तो ये है कि ये वर्ग अपने फ़ायदे के लिए किसी स्तर पर गिर सकता है। मुग़ल सैंकड़ों साल रहे, इसने उनके तलुए चाटकर मलाई खाई! अंग्रेज़ आए तो इसने स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों की मुखबिरी कर उन्हें फांसी पर लटकाया और दलाली खाई! सावरकर पांडु जैसे 'संडास वीरों' ने माफियों की श्रंखला लगाकर माफ़ी के साथ साथ पेंशन के रूप में हड्डी भी पाई और जीवनभर अंग्रेज़ों की चाटता रहा!

इसी तरह वनडे माटरम जैसी शिर्कीया रचना बनाने वाले ने मुसलमानों की नफ़रत और ब्रिटिश दलाली की चाह में फट्टू अंग्रेज़ों को मुस्लिम योद्धाओं से बहादुर दिखाने वाली 'आनंद मठ' लिखी और 'वनडे' वाला गीत तो आज भी फ़साद की जड़ है...!

देश में जब तक मुग़ल और उनके बाद अंग्रेज़ रहे, ये वर्ग ख़ुद हिंदू बल्कि वैदिक धर्मी बताकर सत्ताधीशों से विशेष लाभ उठाता रहा; लेकिन जैसे ब्रिटिश राज ख़त्म होने की कगार पर था, इसने हिंदू महासभा का गठन कर हिंदुत्ववादी चोला ओढ़ लिया!! लेकिन साथ ही उस समय इन्होने एक और भयानक काम को अंजाम दिया, वो था विभाजन! इन्हें पता था कि अखंड भारत के मुसलमान इनके मनुवादी पाखंड को जूतियों तले कुचल देंगे! इसलिएइन्होंने हालात ही ऐसे बनाए के मुहम्मद अली जिन्ना के पास 'अलग' मांग के अलावा कोई चारा नहीं बचा...!

विभाजन के बाद भारत का शासन पर इनका निर्विवाद वर्चस्व हो गया...! तब भी इन्होंने एक और शातिर खेल खेला! हालात के हिसाब से कुछ लोग सेक्यूलर बने, कुछ कम्यूनल तो कुछ कम्युनिस्ट बन गए। कुछ ने किसान यूनियन बनाई, कुछ मजदूर तो किसी ने ट्रेड यूनियन! अनपढ़ दलित, एससी, एसटी के माध्यम से हज़ारों दंगे करवाकर लाखो मुसलमानों को मरवाया, उन्हें आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं होने दिया!

हिंदुत्व की खाल ओढ़े मुसलमानों को मारते रहे और सेक्युलरिज़्म का मुखौटा लगाए इसी वर्ग के लोग हमें डराते रहे कि देखो! हमको ही वोट दो वरना 'वो' आ जाएंगे...! डरपोक मुसलमान वही करता रहा जो ये करवाना चाहते थे! 75 सालों में हज़ारों दंगे हुए, लाखों मियां भाई मरते-कटते रहे और हिंदुत्व को हराने की नाकाम कोशिश करते रहे...!

बाबरी मस्जिद की शहादत तक मुसलमानों ब्राह्मणों को अपना नेता माना, उसके बाद बहुजनों में से मुलायम, मायावती, लालू, नीतीश, पवार जैसों को साथ दिया; लेकिन कभी ब्राह्मणों की गुलामी में रहे ये लोग ब्राह्मणों से बदतर ब्रह्मण्यवादी साबित हुए! इनके ख़ानदान टाटा-बिर्ला जैसे अमीर बने लेकिन मुसलमानों की यथास्थिति बनी रही! आज तो हाल ये है कि फ़र्ज़ी सेक्युलरिज्म मर चुका है और हिंदुत्व के रूप में ब्राह्मण इतने हावी हैं कि इसको बनाए रखने के लिए संसद पर हमला हो सकता है, 26/11 हो सकता है, पुलवामा हो सकता है, जस्टिस लोया मर सकता है...! तमाम सबूत नज़र आने के बाद भी कोई जांच नहीं होती! भला जांच करने वालों की कौन जांच करेगा! वो सरकार में हैं, प्रशासन में हैं, मीडिया में हैं और अदालतों में भी उन्ही का वर्चस्व है..! उनके सामने शरद पवार कचरा, मायावती कचरा, अखिलेश कचरा, नीतीश, तेजस्वी कचरा...! जहां ये सब 'कचरा' हैं तो तुम किस खेत की मूली हो मियां!! इस बीच जो एक नया दल आम आदमी पार्टी के रूप में उभर रहा है, उसका हाल ये है कि अगर मनुवाद पाखाना है तो पूंजीवाद मूत्र!! इसलिए इस गू से निकलकर उस गू में और तमाम गुओं से निकलर पेशाब गिरकर बर्बाद मत होना!

इसलिए हो सके उतनी तालिम हासिल करो, प्रशासन, न्यायव्यवस्था में जाने की कोशिश करो। ख़ुद का मज़बूत मीडिया खड़ा करो और सबसे अहम अपनी आज़ाद सियासत को मज़बूत करो...! 36 गुलामों से मुकाबले 10-15 यौद्धे जिताओ... ज़िंदगी को फ़ानी और मौत को यक़ीनी मानो, फिर ना तुम्हे लिंच किया जाएगा ना आबरू लुटी जाएगी और ना ही अल्लाह के घर शहीद होंगे, ना बेहुरमती करने के लिए किसी की माँ जनेगी...!! अगर ईमान बहुत कमज़ोर है तो फिर सहाबाओं (रज़ी.) के किस्से छोड़ो, 1.72% यानी मुट्ठीभर सिखों से इबरत हासिल करो और सर बुलंद रहो...

जागो मेरे अज़ीज़ों, मेरे प्यारों, नबी (स०) के दुलारों जागो.! जागो, जब तक कि हमेशा के लिए काला अंधेरा छा जाए....🙏

(ज़ुकरबर्ग द्वारा डिलीट करने से पहले कॉपी करके चिपका दो और एक कॉपी व्हाट्सएप के उस नंबर के चैट बॉक्स में चिपका दो जिसने तुम्हे ब्लॉक कर रखा है...!)

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