क्या जिन्ना को अखंड भारत का प्रधानमंत्री बनने की चाह थी??
क्या जिन्ना को अखंड भारत के प्रधानमंत्री पद की चाह थी?
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भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य और आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर पत्रिका के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी ने कहा, ‘दुर्भाग्य से हमारे नेताओं ने इस बारे में नहीं सोचा. अगर हमारे नेताओं ने तब इस बारे में सोचा होता और उन्हें प्रधानमंत्री पद की पेशकश की होती तो कम से कम विभाजन नहीं होता.'
कमोबेश इसी तरह की बात और लोग भी करते हैं कि नेहरू ने जिन्ना को स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया इसलिए जिन्ना ने अलग पाकिस्तान मांग लिया! हालांकि ये बात साफ़ झूठ है। इसमें इतनी सच्चाई है कि गांधी जी का सुझाव था कि जिन्ना को अखंड भारत का प्रधानमंत्री बनाया जाए; लेकिन उनका ये प्रस्ताव खांग्रेस में ही मान्य नहीं हुआ, जबकि जिन्ना तक ये बात गई भी नहीं!
बात तो यही सच है कि बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना पहले खांग्रेस के नेता थे, बाद में मुस्लिम लीग में शामिल हुए। शुरुआती दिनों में तो वो खांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों संगठनों के सदस्य रहे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि खांग्रेस पार्टी पर बहुसंख्यकवादियों का वर्चस्व हो गया है तो वो खांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम लीग नेता और खांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी बन गए..
खांग्रेस की कारगुजारियों को देखकर जिन्ना को आज़ाद भारत में मुसलमानों के भविष्य की चिंता हुई और वहीं से उन्होंने मुस्लिम अधिकारों की वकालत शुरू कर दी। वो चाहते थे कि आज़ाद भारत में मुसलमानों को, हर रियासत को पूर्ण स्वायत्ता मिले। मुस्लिम बहुल प्रांतों का विभाजन ना किया जाए, ना ही जनसंख्या में हेरफेर किया जाए। विदेश मामला, सेना, दूरसंचार और करेंसी को छोड़कर तमाम मामले राज्यों के अधीन हो। देश का संविधान संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह 100% फ़ेडरल रहे और जब तक राज्य सहमति नहीं देते तब तक संविधान में कोई संशोधन ना हो... लेकिन नेहरू और खांग्रेस ने जिन्ना के साथ वही सुलूक किया जो आज तथाकथित सेक्यूलर दल असदुद्दीन ओवैसी के साथ करते हैं...!!
👇यही वो 14 मांगे हैं जो जिन्ना ने अखंड भारत के लिए खांग्रेस के सामने रखी थी, जिसे खांग्रेस ने ठुकरा दिया...!!
1. भारतीय संविधान संघात्मक हो, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रान्तों को दी जाये।
2. भारत के सभी प्रान्तों में स्वराज्य एक ही प्रकार का हो।
3. समस्त प्रान्तों के विधानमण्डलों में अल्प-संख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाये।
4. केंद्रीय विधानमण्डलों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व कम से कम एक हो।
5. सभी सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की जाये।
6. सिंध प्रदेश को बम्बई से अलग किया जाय।
7. सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों को योग्यतानुसार उचित प्रतिनिधित्व मिले।
8. केंद्रीय विधानमण्डल द्वारा संघीय संविधान में कोई भी संशोधन प्रान्तों की सहमति से किया जाय।
9. केन्द्रीय या प्रान्तीय विधानमण्डलों में कम से कम एक तिहाई मंत्री मुस्लिम हों।
10. संविधान के अन्तर्गत अल्प-संख्यकों की शिक्षा, संस्कृति व भाषा की रक्षा की जाये।
11. सीमा प्रान्त व बलूचिस्तान में भी अन्य प्रान्तों की ही भांति सुधार किया जाये।
12. पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तार सीमाप्रांत का कोई ऐसा पुनर्गठन न हो, जिससे मुस्लिम बाहुल्य समाप्त हो।
13. प्रान्तों की सीमा परिवर्तन में मुस्लिम बहुत प्रान्तों में उनका बहुमत समाप्त न किया जाये।
14. किसी भी विधानसभा में ऐसा कोई प्रस्ताव न पेश किया जाये, जिसका कि किसी सम्प्रदाय के 3/4 सदस्य विरोध करें।
इन मांगों में प्रधानमंत्री पद कहीं भी नहीं है। दूसरी बात ये कि जिन्ना को टीबी हो चुकी थी जो उस वक़्त लाइलाज बीमारी थी। उनकी ये बीमारी आखिरी स्टेज पर थी। ये बात सिर्फ़ जिन्ना, उनकी बहन फ़ातिमा और फ़ैमिली डॉक्टर जाल पटेल जानते थे। लेकिन डॉ. जाल पटेल इतने प्रोफ़ेशनल थे कि हिंदू होने के बावजूद उन्होंने जिन्ना की बीमारी का राज़ किसी खांग्रेसी नेता को नहीं बताया, वरना शायद इतिहास कुछ और होता!
ख़ैर, जो होना था, वही हुआ। लेकिन जिन्ना की गंभीर बीमारी के हिसाब से ये साफ़ हो जाता है कि अलग पाकिस्तान के मांग के पीछे उन्हें प्रधानमंत्री पद की लालसा नहीं थी..! जिस व्यक्ति को पता हो कि उसकी मौत बहुत जल्द होने वाली हो, भला वो सिवाय जीने के और क्या चाहेगा!
इसलिए ये बात सरासर झूठ है कि जिन्ना ने प्रधानमंत्री बनने की जिद में पाकिस्तान मांगा और उन्हें पहला प्रधानमंत्री बना दिया जाता तो विभाजन रुक जाता! जिन्ना की मांगे गहरी थी। अगर मानी जाती तो खांग्रेस का राज हो या मोदी का, कोई इतना निरंकुश राज नहीं पाता। राज्यों पर दिल्ली की दादागिरी ना चलती, ना ही कश्मीर जैसे मुस्लिम बहुलता वाले राज्य को खिलौने की तरह खेला जाता...! ना बाबरी मस्जिद तोड़ने की हिम्मत होती, ना गाय इंसान के जान से कीमती होती, ना मुसलमानों ख़िलाफ़ हज़ारों दंगे होते, ना मुसलमानों को जेलों में सड़ाया जाता, ना अदालतों में कानून और इंसाफ़ ओर आस्था हावी होती, ना कश्मीर और पूर्वोत्तर जलता, ना सैन्य विशेषाधिकार के तहत वहां जुल्म होता, ना दलितों पर ज़ुल्म होता, ना आदिवासियों की ज़मीनें हड़पी जाती, ना ही किसी माँ ने ऐसा हिंदू चरमपंथी जना होता जो किसी ग़रीब मुसलमानों से ज़बरदस्ती JSR का नारा लगा सके...!!
अगर जिन्ना की मांगे मान ली गई होती तो वो कुछ नहीं होता जो आज हो रहा है। अखंड भारत USA की तरह एक खुशहाल देश होता...!!
ये तो अगर-मगर की बातें हैं। हक़ीक़त तो यही है कि जो होना था, वही हुआ; लेकिन इस होनी के पीछे जो वजह बताई जाती है कि जिन्ना ने प्रधानमंत्री बनने के लिए देश का विभाजन किया था, वो झूठ है, झूठ है...!!
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