हिंदू धर्महित सर्वोपरि!

धर्म को राष्ट्र से ऊपर कौन मानता है?
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भारत के मुसलमानों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि 'आपके लिए  धर्म बड़ा है या देश!'... सवाल के साथ साथ इल्ज़ाम भी लगाया जाता है कि मुसलमान अपने धर्म को, देश के ऊपर रखते हैं!

पहली बात तो ये कि देश सर्वोच्च कानून 'संविधान' है और इसी संविधान ने हर भारतीय को अपने पसंद के मुताबिक धर्म को चुनने, उसका पालन करने और उसे प्रचारित करने की पूरी पूरी छूट दे रखी है। हर आस्था संवैधानिक है चाहे वो किसी की भी हो। फिर भी तुलना करनी ही है तो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें मुसलमानों की आस्था की वजह से कहीं संविधान और कानून का उलंघन हुआ हो, जबकि आज़ाद भारत में ऐसे सैंकड़ों नहीं बल्कि हज़ारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें संविधान और कानून के निर्देशों को धता बताकर जाति या आस्था को तरजीह दी गई है।

स्वतंत्र भारत में सभी बड़े बड़े घोटाले, बड़े बड़े नरसंहार हिंदुओं ने किये हैं; मगर हिंदू सरकारों ने, हिंदू अधिकारियों ने, यहां तक कि हिंदू जजों ने संविधान और कानून से उठकर आरोपियों को बचाया है, सिर्फ 'हिंदू' होने की बुनियाद पर! संविधान है, आईपीसी है, सीआरपीसी... ये  सब देश के कानून हैं, जिन पर अमल नहीं करने वाला देशद्रोही है। मुस्लिम विरोधी हज़ारों दंगे हुए, लाखों मुसलमान मारे गए, अरबों की जायदाद लूटी, बर्बाद की गई, लाखों लोग विस्थापित हुए... दिन के उजाले में, दुनिया भर की मीडिया के सामने बाबरी मस्जिद तोड़ी गई, मगर किसी भी आरोपी को सज़ा नहीं मिल सकी; क्योंकि सब के सब हिंदू धर्म से संबंध रखने वाले थे! यानी कि राष्ट्र के कानूनों को तोड़कर राष्ट्रद्रोहियों को बचाया गया, केवल हिंदुत्व की बुनियाद पर!!

बाबरी मस्जिद का मामला कोर्ट में चल रहा था, मुसलमान साफ़ कह रहे थे कि 'अदालत का जो फैसला आएगा,उसे हम कबूल करेंगे'.. जबकि इस्लामिक आस्था और वक़्फ़ कानून साफ कहता है कि मस्जिद का स्टेटस नहीं बदला जाता, जहां मस्जिद बन जाती है, वह कायम रहती है। इस्लामिक आस्था कहती है कि जहां एक बार मस्जिद बन गई, उसके नीचे पाताल तक और ऊपर सातवें आसमान तक मस्जिद की मिल्कियत हो जाती है... फिर भी, भारत का मुसलमान, यही कहता रहा कि 'अदालत का फ़ैसला मान्य होगा!'... जबकि इसके उलट, हिंदू चेतावनी देते रहे कि 'अदालत का फ़ैसला जो भी हो, मंदिर तो वही बनेगा!'... यानी मुसलमान हर मौके पर संविधान के साथ और हिंदू उसके ख़िलाफ़! फिर कौन हुआ राष्ट्रवादी और कौन हुआ राष्ट्रद्रोही???

देश को दीमक की तरह लगे भ्रष्टाचार के पीछे हिंदू ही हैं, अरबों, खरबों के घोटालेबाज हिंदू ही हैं, यहां तक देश का सबसे बड़ा आतंकी संगठन- आरएसएस भी हिंदुओं ही का है..!! घोटालेबाज/चरमपंथी अव्वल तो पकड़े जाते नहीं, कभी पकड़े भी गए तो पहले ज़मानत पर और बाद में निर्दोष छूट जाते हैं..!

विधायक, सांसद और मंत्री संविधान की शपथ लेकर पद ग्रहण करते हैं; मगर आचरण बिल्कुल संविधान विरोधी! हर सरकारी काम, योजना, परियोजना की शुरुआत वैदिक पद्धति से की जाती है- जलपूजन, भूमिपूजन, शस्त्रपूजन.. आदि. यहाँ तक कि राष्ट्रीय झंडा भी पूजा पाठ के बाद फहराया जाता है...! जहां जहां संविधानवाद होना चाहिए, वहां हिंदुत्ववाद लागू कर दिया गया है।

बाबरी मस्जिद की ज़मीन और विध्वंस के फ़ैसले ने तो पूरी दुनिया को चीख़ चीख़कर बता दिया है कि भारत में संविधान और कानून से ऊपर हिंदू धर्म की मान्यताएं है! 'राष्ट्रहित सर्वोपरि' वाली बकवास करने वालों ही ने राष्ट्र की बुनियाद खोदकर राष्ट्रद्रोह किया है; मगर नीचता का स्तर इतना कि राष्ट्रवाद का बोझ मुसलमानों पर डालकर अपने राष्ट्रद्रोही कुकर्मों को छुपाते हैं...

✍️ Javed Patel,

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