ये ग़ुलामी नहीं तो और क्या है?

राष्ट्रवादी खांग्रेस पार्टी, युवक विभाग यानी कि पोट्टों के प्रदेशाध्यक्ष जनाब महबूब शेख़ ने मराठा समाज के युवाओं के उज्वल भविष्य के प्रधानमंत्री को एक करोड़ पत्र भेजकर मराठा आरक्षण के लिए अभियान शुरू किया है!
चूंकि राष्ट्रवादी खांग्रेस पार्टी ही मराठों की मिल्कियत है इसलिए इस अभियान को समझा जा सकता है; लेकिन कमाल की बात तो ये है कि मराठा आरक्षण के लिए प्रधानमंत्री को एक करोड़ पत्र लिखने का संकल्प करने वाले 'महबूब भाई', मुस्लिम आरक्षण के लिए एक वाक्य लिखने को तैयार नहीं! सिर्फ महबूब शेख ही नहीं बल्कि पार्टी का कोई मुस्लिम मंत्री, सांसद, विधायक, मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर मुंह खोलने को तैयार नहीं है...!!

जिसका अपना समाज अनुसूचित जाति, जनजातियों से बदतर ज़िंदगी जी रहा है, जिसके अपने समाज के युवाओं का भविष्य मॉब लिंचिंग में मारे जाना और आतंकवाद, देशद्रोह के झूठे आरोपों में जेलों में सड़ना बन चुका है, वो मुस्लिम नेता, मराठा युवाओं के लिए करोड़ों की उड़ानें भर रहा है..!!

माना कि हर नेता को पार्टी की लाइन पकड़कर चलना पड़ता है; लेकिन जो पार्टी धर्मनिरपेक्षता के भीष्मपितामह शरद पवार के नेतृत्व में चलाई जा रही है, उस पार्टी का नेता, बल्कि मुस्लिम नेता, मुस्लिम समाज के लिए कुछ बोल नहीं सकता, तो ये गुलामी नहीं तो और क्या है???

सात दशकों से जो समाज सत्ता की मलाई उड़ा रहा है, जिस समाज ने अपनी जनसंख्या से अधिक सांसद, विधायक और मंत्री पदों पर कब्ज़ा कर रखा हो, इतना ही नहीं, जिस समाज के पास राज्य के 90% सहकारिता बैंक, चीनी मिलें, कॉटन मिलें, दूध उत्पादक संस्थाए, जिला मध्यवर्ती बैंक हो, उस समाज को जबरन गरीब बताकर आरक्षण दिया जा रहा है! जबकि इस आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ठुकरा चुका है, फिर भी अब संविधान में प्रावधान करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और सारे राजनीतिक दल उसका समर्थन कर रहे हैं। लेकिन कंगाल मुस्लिम समाज के आरक्षण को लेकर कोई एक शब्द बोलने को तैयार नहीं, बल्कि फर्जी धर्मनिरपेक्ष दलों के मुस्लिम नेता भी मराठा आरक्षण आंदोलन चलाते हुए खुद अपने समाज के लिए चुप हैं, तो इन नेताओं को गुलाम नहीं तो और क्या कहें?? एक गुलाम ही होता है जो अपने आक़ा की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं कर सकता..!!

मुसलमानों को चाहिए कि हर राजनीति दल में काम करें, लेकिन कार्यकर्ता बनकर करें, गुलाम नहीं!!

टिप्पणियाँ